हमारे बारे में

निदेशक का प्राक्कथन

भारतीय विज्ञान संस्थान (भाविसं) की परिकल्पना एक शोध संस्थान या शोध विश्वविद्यालय के रूप में जमशेत जी नसरवान जी टाटा द्वारा, उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में की गई थी । इस परिकल्पना से लगभग तेरह वर्षों के लंबे अंतराल के पश्चात 27 मई 1909 को इस संस्थान का जन्म हुआ । इस संस्थान प्रारंभिक इतिहास भारतीय उच्च शिक्षा और बैज्ञानिक शोध का एक स्वर्णिम अध्याय रहा है । संस्थान की स्थापना में अनेक ख्यात (गौरवशाली) व्यक्तियों का योगदान रहा है । इनमें प्रमुख हैं जमशेत जी टाटा, स्वामी विवेकानंद, जो सर्वविदित शिकागो यात्रा में उनके सहयात्री थे, मैसूर के महाराजा श्री कृष्णराज वाडयार – IV, उनकी माता और भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन का उनकी नियुक्ति के बाद पहला कार्य था संस्थान की स्थापना सम्बद्ध समिति की प्रस्तावना का अधिग्रहण । इस प्रस्ताव को मूर्त रूप देने में कई वर्ष लगे और इस कठिन अवधि में जमशेत जी टाटा के सहकर्मी बुरोरजी पादशाह की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही । दुर्भाग्यवश, अपनी कल्पना को साकार देखने के कुछ वर्ष पूर्व ही जमशेत जी टाटा का 1904 में निधन हो गया । सन 1909 में ब्रिटिश सरकार के भारतीय विज्ञान संस्थान का स्थापनादेश जारी करने के साथ उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्रों में एक अद्वितीय प्रयोग का शुभारंभ हो गया । भारतीय विज्ञान संस्थान सार्वजनिक निजी क्षेत्र की साझेदारी का पहला उदाहरण है यह एक ऐसा संस्थान है जिसके प्रादुर्भाव की आधार शिला एक शताब्दी से भी अधिक समय तक अपनी दृढ़ता का साक्षी रही है ।

भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलूर के लगभग 400 एकड़ उत्कृष्ट भूमि में व्याप्त है, जिसे मार्च 1907 में मैसूर के महाराजा द्वारा उदारता-पूर्वक दान में दिया गया था । मैसूर के राजवंश द्वारा दिया गया यह योगदान जे एन टाटा के प्रस्तावित संस्थान के स्थान के निर्धारण का कारण रहा है । टाटा यह नहीं चाहते थे, इस संस्थान के साथ उनका नाम जुड़ा रहे । उनका सपना था एक ऐसे संस्थान के निर्माण का था, जो भारत के विकास में अपना योगदान दे सके । भारतीय विज्ञान संस्थान हर प्रकार से जे एन टाटा की अपेक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है । बेंगलूर आनेवाले भा वि सं का पता लगाने के लिये अभी भी स्थानीय व्यक्तियों से टाटा इंस्टिट्यूट का पता पूछते हैं जो जमशेत जी टाटा के उदारता पूर्ण कार्य के प्रति सतत श्रद्धांजलि है । एक शताब्दी के बीत जाने पर भी सार्वजनिक स्मृति में जमशेत टाटा जी के महान प्रयासों का साक्षी बना रहा है ।

यह संस्थान केवल दो विभागों के साथ प्रारंभ हुआ था सामान्य व अनुप्रयुक्त रासायनिकी तथा विद्युत प्रौद्योगिकी । इसके प्रथम निदेशक मोरिस डब्ल्यू ट्रावर्स ने वर्ष 1906 के अंत में भारत आने के तुरंत बाद संस्थान को संगठित करने का प्रयास किया । ट्रावर्स ने, मुख्य भवन के निर्माण का कार्य प्रारंभ किया आज बेंगलूर का एक सीमाचिह्न बन गया है। आरंभिक विभागों कार्वनिक रासायन शास्त्र तथा जैव रासायन शास्त्र - के बाद वर्ष 1933 में भौतिकी विभाग अस्तित्व में आया, जब सी वी रामन इस संस्थान के प्रथम भारतीय निदेशक बने ।

विगत शताब्दी में अपनी स्थापना के समय से ही भा वि सं, विज्ञान तथा अभियांत्रिकी में अनुसंधान तथा स्नातकोत्तर शिक्षा के लिये भारत का प्रमुख केंद्र रहा है । विगत सौ वर्षों में संस्थान का विकास भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास में प्रतिबिंबित हुआ है । दीर्घ इतिहास, शैक्षिक अनुसंधान की एक दृढ़ परंपरा तथा विद्वत्तापूर्व कार्यकलापों के लिए अनुकूल परिवेश इस संस्थान को विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के लिये अत्यंत आकर्षक स्थान बनाने वाले महत्वपूर्ण तत्व बन गये हैं । जैसे - जैसे संस्थान का विस्तार हुआ नये- नये अनुसंधान के क्षेत्र स्थापित किये गये हैं - उनमें से अधिकांश भारत में पहली बार बने हैं। जैव रासायनिकी से लेकर अंतिरक्ष अभियांत्रिकी तक के क्षेत्रों में संस्थान के विभागों ने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है अनेक सरकारी एवं निजी क्षेत्रों से सम्बद्ध अनुसंधान एवं विकास में संस्थान की राष्ट्रीय भूमिका है । संस्थान के शिक्षक एवं पूर्व छात्रों ने, देश भर में अनेकों नये संस्थानों तथा कार्यक्रमों की स्थापना एवं नेतृत्व किया तथा जो वास्तविक अर्थ में राष्ट्र के उत्थान एवं विकास के लिये इस संस्थान के प्रमुख योगदान को प्रतिबिंबित करते हैं । होमी भाभा ने भा वि सं के भौतिकी विभाग में कार्यरत हुए ही टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (टीआईएफआर) तथा परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के विचारों को जन्म दिया था । विक्रम साराभाई - भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापक - इस संस्थान के भूतपूर्व छात्र रहे हैं । उनके असामयिक निधन के बाद, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इस्रो) का निर्माण सतीश धवन के दूरदर्शी के नेतृत्व में किया गया जो उस समय संस्थान के निदेशक थे । प्रथम भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर की स्थापना जे सी घोष द्वारा की गई थी, जो 1939-48 के दौरान भा वि सं के निदेशक रहे - इस दौरान ही, संस्थान में अभियांत्रिकी में त्वरित गति से अनुसंधान कार्य किया गया । भारत के अधिकांश प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, छात्र या शिक्षक के रूप में संस्थान से जुड़े रहे हैं । जी एन रामचंद्रन, हरिश्चंद्र, एस रामशेषन, ए रामचंद्रन, सी एन आर राव तथा आर नरसिंह इनमें उल्लेखनीय हैं । संस्थान के भूतपूर्व छात्र, भारत तथा विदेशों में अनेकों प्रमुख संगठनों के प्रधान रहे हैं ।

भारतीय विज्ञान संस्थान, अभियांत्रिकी में स्नातकोत्तर शिक्षा तथा विज्ञान एवं अभियांत्रिकी की विभिन्न शाखाओं में, शोध कार्यक्रम व उपाधि प्रदान करता है । विगत वर्ष में संस्थान में 4 वर्षीय स्नातकोत्तर शिक्षा (बी.एस. उपाधि) कार्यक्रम प्रारंभ किया गया है, जो छात्रों के अनुसंधान के प्रति उन्मुख होने के साथ – साथ विज्ञान में ठोस बुनियाद प्रदान करता है । संस्थान की अनुसंधान प्रयोगशालाएँ आधुनिक सुविधाओं से युक्त हैं । ग्रंथालयों का आधुनिकीकरण प्रगति पर हैं । भारतीय विज्ञान संस्थान प्रति वर्ष भारत तथा विदेश के सैंकड़ों वैज्ञानिकों तथा शोधार्थियों का आतिथेय बनता है तथा अनेकों प्रमुख राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यक्रम का केन्द्र बिन्दु है ।

विगत कुछ वर्षों में विज्ञान एवं अभियांत्रिकी अनुसंधान का रूप त्वरित गति से परिवर्तित हो रहा है । अपने स्थापना के द्वितीय शताब्दी में पहुँचते - पहुँचते संस्थान ने अनेकों नये-नये कार्यकलाप प्रारंभ किया है । उनमें से उल्लेखनीय है – अति सूक्ष्म विज्ञान एवं अभियांत्रिकी में शोध कार्यक्रम । इन कार्यक्रमों का आशय रहा है – अति सूक्ष्म विज्ञान की शाखाओं की पारंपरिक सीमाओं को कम करना तथा एतत्द्वारा, विज्ञान की प्रत्येक शाखा में अनुसंधान का उन्नयन करना । परिवहन अभियांत्रिकी में एक स्नातकोत्तर कार्यक्रम वर्ष 2010 में प्रारंभ किया गया है तथा प्रबंधन में स्नातक कार्यक्रम के साथ - साथ प्रौद्योगिकी प्रबंध तथा व्यवसाय विश्लेषिकी उपशाखा को इस वर्ष प्रारंभ किया गया है । पृथ्वी-विज्ञान, जलवायु परिवर्तन तथा तंत्रिका विज्ञान (न्यूरोसाइन्स) के क्षेत्रों में नये केंद्र स्थापित किये गये हैं । आगामी वर्षों में यह संस्थान सहयोगात्मक एवं अंतर्शाखाओं में अनुसंधान को प्रभावशाली रूप से प्रोत्साहित करने की आशा रखता है । यह संस्थान विज्ञान एवं अभियांत्रिकी क्षेत्रों में उच्च-स्तरीय शोध के उन्नयन के लिये प्रतिबद्ध है ।

यह संस्थान विभिन्न प्रकार के अधिक्रमिक कार्यक्रमों के द्वारा समाज एवं उद्योग के साथ अंतर्कियाओं में कार्यरत है । वैज्ञानिक एवं औद्योगिक परामर्श केंद्र (सीएसआईसी) तथा नवोन्मेष एवं विकास संघ (एसआईडी) ये दोनों केंद्र उद्योगों के साथ संबंध स्थापित करते हैं वहीं पर शिक्षा निरंतरता केंद्र (सीसीई), कार्यरत विज्ञानियों एवं अभियंताओं को अपने शैक्षिक शक्ति को समृद्धि बनाने के लिये अवसर प्रदान करता है । यह संस्थान सक्रिय रूप से, ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन तथा संचालन करता है जो प्रतिभा संपन्न युवा विद्यालयी छात्रों तथा स्नातक कक्षा के छात्रों को अपने अनुसंधानात्मक व्यावसायिक जीवन का अनुसरण करने हेतु प्रेरणा देते हैं । संस्थान का विज्ञान एवं अभियांत्रिकी में युवा अधिसदस्यता कार्यक्रम युवा छात्रों को ग्रीष्म काल में अपने परिसर में शोध संबंधी कार्यक्रम में सहभागी बनने का अवसर देता है । भारतीय विज्ञान संस्थान भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना (केवीपीवाय) का भी संचालन करता है । परिसर पर स्थित कर्नाटक राज्य के विज्ञान वं प्रौद्योगिकी परिषद के साथ संपोषणीय प्रौद्योगिकी केन्द्र (सीएसटी) द्वारा लिये गये कार्यकलापों द्वारा विशेष रूप से महत्व दिये गये तथा सामाजिक रूप से संगत अनुसंधान के प्रति वचनबद्ध है।

इस संस्थान ने वर्ष 2009 में अपने अस्तित्व की एक शताब्दी पूरी की है । विस्तरण एवं नवीकरण के नये चरण के लिये यह सुविधा प्राप्त हुआ है । संस्थान के साथ रहना तथा उसके साथ काम करना अक विशेषाधिकार बन गयो है । शिक्षक वर्ग, शिक्षकेत्तर, पदाधिक तथा विद्यार्थियों को अपने अतीत पर गर्व है तथा उज्जवल भविष्य के लिए अत्यंत आशावान हैं ।

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